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तबाही के इतने करीब पहुंच गए हैं हम, वैज्ञानिकों ने आकंलन कर बताया समय

नई दिल्‍ली: क्या आपको लगता है कि साल 2020 तबाही का पीक समय है? तो आप ज्‍यादा गलत नहीं है, क्योंकि किसी भी पल हालात और भी खराब हो सकते हैं, या कम से कम कुछ दशकों में तो यह समय आ ही जाएगा!

पहले ही यह ग्रह ढेर सारे संकटों का सामना कर रहा है, जैसे उदाहरण के तौर पर जलवायु परिवर्तन. दुनिया भर में मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तन हो रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में ऐसी आग लगी हैं जो अकल्पनीय हैं, लाखों हेक्‍टेयर जमीन, अनगिनत जानवर इस आग की भेंट चढ़ गए हैं. भारत में प्रदूषण का स्‍तर अपने ही रिकॉर्ड तोड़ रहा है. पृथ्‍वी ग्रह के फेंफड़े कहे जाने अमेजन के जंगलों की कटाई और उनमें लगी आग! इतना सब कुछ हमारी धरती पहले ही झेल रही है. 

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संसाधनों का बेतहाशा उपयोग 

प्राकृतिक संसाधनों और इनके उपयोग की तुलना करें तो संसाधनों का बेतहाशा उपयोग हो रहा है और हो सकता है कि इन संसाधनों को दोबारा पाना संभव भी न हो. ऐसे में बचे हुए संसाधान आने वाले दशकों में पूरे ग्रह की आबादी के लिए काफी नहीं हैं.

VICE द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में 2 सैद्धांतिक भौतिकविदों ने निष्कर्ष निकाला है कि मानव समाज का विनाश अगले 2 से 4 दशकों में खुद के आत्‍म-विनाशकारी तरीके के कारण तय है. 

चिली और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने अपने यह निष्‍कर्ष Nature Scientific में प्रकाशित किए हैं. मानव समाज के पतन के संभावित समय का पता लगाने के लिए उन्‍होंने सांख्यिकीय मॉडलिंग (statistical modelling) का उपयोग किया. इसके जरिए उन्‍होंने पता लगाने की कोशिश की कि बढ़ती मानव आबादी और संसाधनों की कमी समाज के लिए बुरी खबर कब लाएगी.

इसके बाद लेखकों ने अपने अध्ययन के सार में लिखा है – ‘संसाधनों की खपत की मौजूदा दर और इसकी अनुमानित तकनीकी दर के आधार पर किए गए हमारे अध्ययन से पता चलता है कि हमारे सामने विपत्तिपूर्ण पतन का सामना किए बिना जीने की बहुत कम संभावना है. यदि इसे लेकर सबसे आशावादी अनुमान भी लगाएं तो भी इसकी संभावना 10 प्रतिशत से कम है.’ 

खतरनाक है वनों की कटाई

इन वैज्ञानिकों के अनुसार, हालातों के इतने बिगड़ने के पीछे पहला कारण वनों की कटाई होगा. जलवायु संकट समुद्र के स्तर को बढ़ा रहा है, जिससे मौसम में विचित्र बदलाव, बाढ़, प्राकृतिक आपदाएं आ सकती हैं. लेकिन लेखकों ने मुख्य रूप से वनों की कटाई को ध्यान में रखा, क्योंकि इसे आसानी से मापा जा सकता है. 

वर्तमान में जिस दर से जंगलों की कटाई हो रही है, उसके आधार पर सौ-दो सौ साल में इस ग्रह से जंगल गायब हो जाएंगे. यदि आप सोचते हैं कि यह बहुत लंबा समय है, तो यह गलत है. हम पहले से ही बड़े पैमाने पर गैर-जिम्मेदाराना तरीके से की गई कटाई के प्रभावों को महसूस कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि समय के साथ इसके संकेत और लक्षण और अधिक स्पष्ट हो जाएंगे. लिहाजा, पतन से मतलब एक बार में होने वाली घटना नहीं है.

संसाधनों में आ रही भारी कमी के कारण हम हमारे अस्तित्‍व के लिए जरूरी बुनियादी सिस्‍टम को खो सकते हैं, फिर चाहे बात ऑक्सीजन उत्पादन की हो या मिट्टी के संरक्षण या वाटर चक्र के रेगुलाइज होने की. 

हम पहले ही 6 करोड़ वर्ग किलोमीटर के जंगलों से 4 करोड़ वर्ग किलोमीटर पर पहुंच गए हैं. लिहाजा, इस तबाही को बेहद कम शब्‍दों में ऐसे समझ सकते हैं कि – ‘जंगल नहीं, तो इंसान नहीं!’ 

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